दिन में मेहनतकश, रात में कलाकार: गांवों में जिंदा है आनश्वेन दासी ओपेरा की परंपरा

14:15:44 2026-05-26
दिन भर खेतों, दुकानों या छोटी-मोटी नौकरियों में मेहनत करने वाले ये लोग शाम होते ही कलाकार बन जाते हैं। दक्षिण-पश्चिम चीन के क्वेइचो प्रांत के गांवों में कटे हुए सरसों के खेत ही मंच का रूप ले लेते हैं, जहां ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच सदियों पुरानी लोककला ‘आनश्वेन दासी ओपेरा’ जीवंत हो उठती है। रात के खुले आसमान के नीचे होने वाला यह प्रदर्शन सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को बचाने की एक कोशिश है। किसान, सुरक्षा गार्ड और दुकानदार जैसे सामान्य ग्रामीण अपनी मेहनत और लगन से इस धीरे-धीरे लुप्त होती कला परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।
दिन भर खेतों, दुकानों या छोटी-मोटी नौकरियों में मेहनत करने वाले ये लोग शाम होते ही कलाकार बन जाते हैं। दक्षिण-पश्चिम चीन के क्वेइचो प्रांत के गांवों में कटे हुए सरसों के खेत ही मंच का रूप ले लेते हैं, जहां ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच सदियों पुरानी लोककला ‘आनश्वेन दासी ओपेरा’ जीवंत हो उठती है। रात के खुले आसमान के नीचे होने वाला यह प्रदर्शन सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को बचाने की एक कोशिश है। किसान, सुरक्षा गार्ड और दुकानदार जैसे सामान्य ग्रामीण अपनी मेहनत और लगन से इस धीरे-धीरे लुप्त होती कला परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।
दिन भर खेतों, दुकानों या छोटी-मोटी नौकरियों में मेहनत करने वाले ये लोग शाम होते ही कलाकार बन जाते हैं। दक्षिण-पश्चिम चीन के क्वेइचो प्रांत के गांवों में कटे हुए सरसों के खेत ही मंच का रूप ले लेते हैं, जहां ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच सदियों पुरानी लोककला ‘आनश्वेन दासी ओपेरा’ जीवंत हो उठती है। रात के खुले आसमान के नीचे होने वाला यह प्रदर्शन सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को बचाने की एक कोशिश है। किसान, सुरक्षा गार्ड और दुकानदार जैसे सामान्य ग्रामीण अपनी मेहनत और लगन से इस धीरे-धीरे लुप्त होती कला परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।
दिन भर खेतों, दुकानों या छोटी-मोटी नौकरियों में मेहनत करने वाले ये लोग शाम होते ही कलाकार बन जाते हैं। दक्षिण-पश्चिम चीन के क्वेइचो प्रांत के गांवों में कटे हुए सरसों के खेत ही मंच का रूप ले लेते हैं, जहां ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच सदियों पुरानी लोककला ‘आनश्वेन दासी ओपेरा’ जीवंत हो उठती है। रात के खुले आसमान के नीचे होने वाला यह प्रदर्शन सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को बचाने की एक कोशिश है। किसान, सुरक्षा गार्ड और दुकानदार जैसे सामान्य ग्रामीण अपनी मेहनत और लगन से इस धीरे-धीरे लुप्त होती कला परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।
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