चीन की राजधानी बीजिंग में हुई सेंट्रल इकोनॉमिक वर्क कॉन्फ्रेंस चीन के लिए काफी अहम रही। इस बैठक में सिर्फ साल 2026 की आर्थिक प्राथमिकताएं तय नहीं हुईं, बल्कि 2026 से 2030 तक चलने वाली 15वीं पंचवर्षीय योजना की बुनियाद भी रखी गई। सीधी भाषा में कहें, तो चीन अब यह तय कर रहा है कि अगले पाँच साल वह किस रास्ते पर चलेगा।
चीन की राजधानी पेइचिंग में शनिवार को भारतीय दूतावास का परिसर हिंदी की आवाज़ों, मुस्कुराहटों और आत्मीय संवाद से भर उठा। मौका था विश्व हिंदी दिवस का, जो हर साल 10 जनवरी को मनाया जाता है।
चीन की राजधानी पेइचिंग में हुई सेंट्रल इकोनॉमिक वर्क कॉन्फ्रेंस में चीन के नेताओं ने साल 2026 की दिशा साफ़ कर दी है। इस बैठक में 15वीं पंचवर्षीय योजना यानी 2026 से 2030 तक की तैयारी की नींव रखी गई और 2026 के लिए सरकार की प्राथमिकताएं बताई गईं। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अगुवाई में हुई इस कॉन्फ्रेंस का सीधा सा मकसद है, देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखते हुए आगे बढ़ाना और अपनी अंदरूनी ताकत बढ़ाकर बाहरी चुनौतियों से निपटना। सरकार ने साफ़ कहा है कि अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए ज्यादा खर्च किया जाएगा, नीतियों में ढील दी जाएगी, नई तकनीक और उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और लोगों की खरीदारी की ताकत बढ़ाने पर जोर रहेगा। इस पूरे मुद्दे पर बात करने के लिए हमारे साथ जुड़ी हैं जेएनयू की प्रोफेसर और ‘नेशन-स्टेट डायलॉग’ की फाउंडर डॉ. गीता कोछड़।
क्या आपको याद है वो दौर… जब भारत और चीन के बीच सिर्फ़ तल्खी और तनाव की खबरें आती थीं? पिछले पाँच साल... जी हाँ, पूरे पाँच साल हमने सरहद पर जमी उस बर्फ को देखा है, जो पिघलने का नाम ही नहीं ले रही थी। लेकिन कहते हैं न, कि वक्त हर ज़ख्म का मरहम होता है। और साल 2025 तो मानो दोनों पड़ोसियों के लिए मरहम और नई उम्मीद की किरण लेकर आया है।
2025 चीन के लिए सिर्फ़ आँकड़ों का साल नहीं रहा, यह सोच बदलने का साल रहा। तेज़ growth से आगे बढ़कर अब फोकस है sustainable और quality development पर। Economy, science, space या green development…. हर जगह एक साफ़ संदेश मिला: आज से ज़्यादा ज़रूरी है कल की मजबूती।
पिछले 5 सालों से भारत और चीन के बीच जो तल्खी और तनाव सरहद पर जमा था, साल 2025 ने उस जमी हुई बर्फ़ को पिघलाकर 'पुनरुत्थान' की एक नई कहानी लिखी है। इस वर्ष का सबसे बड़ा क्षण अगस्त में आया, जब SCO शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की ऐतिहासिक मुलाकात हुई। इस महत्वपूर्ण बैठक में दोनों नेताओं ने साफ किया कि वे अब प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि विकास के साथी हैं, और मतभेदों को विवाद नहीं बनने दिया जाएगा, बल्कि रिश्ते की नींव विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता पर टिकी रहेगी। कूटनीति से इतर, आम जनता के लिए भी रास्ते खुले हैं: जुलाई में चीनी पर्यटकों के लिए टूरिस्ट वीज़ा फिर से शुरू हुआ, और अक्टूबर में 5 साल बाद कोलकाता से क्वांगचो के लिए पहली सीधी फ्लाइट उड़ी, जिससे व्यापार और लोगों से लोगों का संपर्क मजबूत हुआ।
बीजिंग की गलियों में भारतीय खुशबू कैसी गूंजती है? यही कहानी सुना रहे हैं रबियुल बख्श, जो चीन की राजधानी में ‘दास्तान इंडियन रेस्तरां’ की नींव रखने वाले संस्थापक और मास्टर शेफ दोनों हैं।
आज दुनिया एक नए चौराहे पर खड़ी है, जहाँ एशिया की भूमिका बढ़ रही है। चीन और भारत— एशिया के ये दो दिग्गज — दुनिया के भविष्य को आकार देने की क्षमता रखते हैं। दोनों देशों के विकास के रास्ते अलग हैं: चीन लंबी योजनाओं और स्थिरता पर जोर देता है, जबकि भारत अपनी लोकतांत्रिक विविधता और खुले संवाद की ताकत से आगे बढ़ता है। व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के बीच मतभेदों के बावजूद, दोनों के बीच सहयोग की गुंजाइश बनी हुई है। एक बदलती दुनिया में भारत-चीन संबंध न केवल एशिया बल्कि वैश्विक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं। संवाद और समझदारी से ही दोनों देश मिलकर एक बेहतर भविष्य की नींव रख सकते हैं।
समुद्र में हर मिनट एक ट्रक जितना प्लास्टिक गिर रहा है। लेकिन अच्छी बात ये है कि इसे ठीक करने की शुरुआत हो चुकी है। चीन में एक मॉडल ने दिखा दिया कि जब लोग मिलकर काम करें, तो समुद्र भी राहत की साँस ले सकता है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि जमीन पर जो प्लास्टिक बोतल कुछ रुपये में बिकती है, समुद्र से निकली वही बोतल कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदी जाती है। नतीजा ये कि मछुआरों की कमाई भी बढ़ रही है और समुद्र का बोझ भी हल्का हो रहा है। यह पूरी कहानी याद दिलाती है कि बदलाव हमेशा उन्हीं के हाथों से आता है जो जमीन से जुड़े रहते हैं। वीडियो ज़रूर देखें...
दुनिया आज ऐसे उतार–चढ़ाव से गुजर रही है, जो पिछले कई दशकों में देखने को नहीं मिले। पुरानी एकध्रुवीय व्यवस्था ढह रही है और पश्चिमी देशों की वह ताकत, जो अपने आपको हकदार मानकर दुहरी नीति चलाती थी, अब कमजोर पड़ती दिख रही है। सालों तक इस व्यवस्था को बचाए रखने के लिए युद्ध होते रहे, संस्थाएँ टूटती रहीं और संसाधन बर्बाद होते गए। अब वक्त है कि हम एक नए वैश्विक ढाँचे के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएँ, जहाँ हर देश का हित मायने रखे और अंतरराष्ट्रीय कानून ही असली आधार बने।
समुद्र में प्लास्टिक का कचरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर मिनट एक ट्रक जितना कचरा पानी में जा गिरता है। देखें तो लगता है जैसे समस्या इतनी बड़ी है कि इसे ठीक करना मुश्किल है। लेकिन चीन में एक ऐसी पहल हुई है जिसने साबित कर दिया कि अगर सोच बदल जाए, तो रास्ते खुद-ब-खुद निकल आते हैं।