क्या आपने कभी सोचा है कि आने वाले समय में फिल्में कैसी होंगी? क्या वे वैसी ही रहेंगी जैसी आज हम देखते हैं, या कुछ ऐसा होगा जो हमें सचमुच चौंका दे? आज सिनेमा की दुनिया एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। खासकर चीन में, जहां फिल्मों का तरीका तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव की वजह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI।
आज का अंतरिक्ष अब किसी एक देश या सरकार की सीमाओं में बंधा नहीं रहा। पहले जब हम स्पेस की बात करते थे, तो हमारे मन में सिर्फ सरकारी एजेंसियों की छवि उभरती थी... बड़े रॉकेट, भारी बजट और लंबी तैयारी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अब निजी कंपनियां भी इस क्षेत्र में उतर चुकी हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं। सच कहें तो अंतरिक्ष अब एक नया “ग्लोबल मार्केट” बन चुका है।
जब भारत में पितृ पक्ष आता है, तो माहौल थोड़ा शांत और भावुक हो जाता है। घरों में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनकी बातें करते हैं, और दिल में एक अपनापन सा महसूस होता है।
चीन का छिंगमिंग पर्व, जिसे ‘टॉम्ब-स्वीपिंग डे’ भी कहा जाता है, पूर्वजों के प्रति सम्मान और स्मरण का प्रतीक है। इस दिन लोग अपने पूर्वजों की कब्रों की सफाई करते हैं, फूल अर्पित करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन का भी संकेत देता है, जब प्रकृति नए जीवन से भर उठती है। छिंगमिंग हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और परंपराओं का सम्मान करने की प्रेरणा देता है। न्यूज़ स्टोरी में देखिए और जानिए कि छिंगमिंग के अवसर पर पूर्वजों को किस तरह याद किया जाता है...
शनिवार को चीन की राजधानी पेइचिंग में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित डांस-ड्रामा “आदि काव्य” ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कहानियां सीमाओं में नहीं बंधतीं।
आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। देशों के बीच तनाव और व्यापार को लेकर खींचतान बढ़ रही है। कई देश अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए टैरिफ और सुरक्षा वाली नीतियाँ अपना रहे हैं, जिससे दुनिया का संतुलन बदल रहा है। ऐसे समय में एशिया एक नई उम्मीद बनकर सामने आ रहा है। इसी में Boao Forum for Asia जैसे मंच अहम भूमिका निभाते हैं, जो देशों के बीच बातचीत और सहयोग को बढ़ाते हैं। भारत और चीन जैसे बड़े देशों की भूमिका यहां बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। इन्हीं मुद्दों पर बात करने के लिए हमारे साथ हैं जेएनयू की प्रोफेसर और‘नेशन-स्टेट डायलॉग’की फाउंडर डॉ. गीता कोछड़।
हाल ही में चाइना मीडिया ग्रुप ने नई दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रोफेसर और ‘नेशन-स्टेट डायलॉग’ की संस्थापक डॉ. गीता कोछड़ से विशेष बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने बोआओ फ़ोरम और एशिया की बदलती आर्थिक दिशा पर विस्तार से अपने विचार रखे।
हाल के वर्षों में चीन के आर्थिक परिदृश्य में एक सुंदर बदलाव देखने को मिला है, जिसे 'फूल अर्थव्यवस्था' के नाम से जाना जाता है। यह सिर्फ बगीचों और गुलदस्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज यह चीन के ग्रामीण परिदृश्य, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों को पूरी तरह से बदल रही है। देखते हैं यह 'खिलता हुआ' बाजार कैसे गांवों की तकदीर बदल रहा है।
चीन की राजधानी पेइचिंग में भारतीय दूतावास ने 14 मार्च को वसंत मेले का आयोजन किया। इस मेले में भारतीय संस्कृति की विविधता और रंगों की सुंदर झलक देखने को मिली।
चीन में हर साल होने वाली “टू सेशंस” यानी “दो सत्र” देश की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बैठकों में से एक मानी जाती है। इस दौरान देश के नेता और प्रतिनिधि इकट्ठा होकर चीन के विकास, अर्थव्यवस्था और आने वाली नीतियों पर चर्चा करते हैं। इन बैठकों में NPC और CPPCC की बैठक होती है। इसमें सरकार अपनी कामकाज की रिपोर्ट पेश करती है, आर्थिक विकास के लक्ष्य तय किए जाते हैं और देश के भविष्य से जुड़े कई अहम फैसलों पर विचार किया जाता है। इसी पर चर्चा करने के लिए, हमारे साथ जुड़ गये हैं जेएनयू के प्रोफेसर और चीनी और दक्षिण पूर्व एशियाई अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार।
चीन की राजनीतिक व्यवस्था में आयोजित होने वाला वार्षिक‘दो सत्र’केवल एक विधायी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह देश की भविष्यगामी नीतियों का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत संकेतक भी है।
हर साल मार्च आते ही चीन की राजधानी बीजिंग में महत्वपूर्ण पॉलिटीकल सीज़न शुरू हो जाता है, जहां देश की संसद और उसके सबसे बड़े सलाहकार मंच की वार्षिक बैठकें होती हैं। यह वह समय होता है जब चीन अपने आने वाले सालों की दिशा तय करता है। इसे कहा जाता है ‘दो सत्र’ या ‘लियांगहुई’। नाम भले सरल हो, लेकिन इसके मायने बहुत गहरे हैं। ‘दो सत्र’ सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं हैं। यह चीन के आने वाले वर्षों का खाका हैं। यहां देश की आर्थिक रफ्तार, तकनीकी दिशा और वैश्विक भूमिका तय होती है।