हर साल 21 मई को इंटरनेशनल टी डे (अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस) मनाया जाता है। दरअसल, यह दिवस चाय के उस सफर को सलाम करने का दिन है, जो चीन से शुरू हुआ और भारत की गलियों, टपरियों और दिलों तक पहुँचा। देखिए यह न्यूज़ स्टोरी और जानिए चाय की ग्लोबल कहानी के बारे में….
चीन के शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश की सुबह का वह दृश्य आज भी मेरी आंखों में बसा है।
हर साल 21 मई को अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ चाय के स्वाद का नहीं, बल्कि उससे जुड़े एहसास का भी उत्सव है। संयुक्त राष्ट्र ने साल 2019 में 21 मई को अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस के रूप में मान्यता दी थी, ताकि दुनिया को चाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व के बारे में जागरूक किया जा सके।
AI की दुनिया में अब असली लड़ाई सिर्फ लैब्स में नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों, गोदामों और सड़कों पर हो रही है। अमेरिका के पास सबसे बड़ा AI निवेश और बेहतरीन रिसर्च है। लेकिन चीन तेजी से पूरे सिस्टम को AI-फर्स्ट मॉडल में बदल रहा है। Alibaba की लॉजिस्टिक्स कंपनी Cainiao इसका बड़ा उदाहरण है।दिलचस्प बात ये है कि चीन में 83% लोग AI को सकारात्मक मानते हैं, जबकि अमेरिका में सिर्फ 39%। इसके अलावा, चीन में 60 करोड़ से ज्यादा लोग GenerativeAI इस्तेमाल कर रहे हैं।
किसी भी देश का भविष्य उसके युवा तय करते हैं। भारत और चीन, दोनों ही प्राचीन सभ्यताएं हैं और आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। भारत में 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। यह दिन युवाओं को आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण और राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा देता है। वहीं चीन में 4 मई को युवा दिवस मनाया जाता है, जो युवाओं के जुनून, ऊर्जा और देश के प्रति समर्पण का प्रतीक है। दोनों देशों का संदेश एक ही है- “भविष्य खुद बनाना पड़ता है।” जब भारत और चीन के युवा एक-दूसरे की संस्कृति, सोच और सपनों को समझेंगे, तो दोनों देशों के रिश्ते और मज़बूत होंगे। यह वीडियो देखिए और जानिए कैसे भारत और चीन के युवा मिलकर दुनिया को बेहतर बना सकते हैं।
आज दुनिया भर में International Workers’ Day यानी अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन उन करोड़ों मेहनतकश लोगों को समर्पित है, जो अपने पसीने, मेहनत और लगन से समाज और अर्थव्यवस्था की असली नींव तैयार करते हैं। हर साल 1 मई को मनाया जाने वाला यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि श्रमिकों के अधिकार, उनके सम्मान और उनके योगदान को याद करने का एक ख़ास मौका है।
हर साल 1 मई को, दुनिया भर में International Workers’ Day यानी अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है। यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उन करोड़ों मेहनतकश लोगों को सलाम है, जिनकी मेहनत पर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी, हमारी इमारतें, हमारी सड़कें, हमारी फैक्ट्रियां और हमारी पूरी अर्थव्यवस्था टिकती है।
आज दुनिया एक अजीब दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ विकास की दौड़ है, तो दूसरी तरफ खुद धरती सांस लेने के लिए संघर्ष कर रही है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण और रेगिस्तान का बढ़ता दायरा अब सिर्फ़ किताबों तक सीमित शब्द नहीं रह गए हैं; वे हमारी रोज़मर्रा की हकीकत बन चुके हैं। सवाल बिल्कुल साफ़ है: अगर हमने अभी अपनी आदतें नहीं सुधारीं, तो भविष्य में क्या बचेगा? इस बढ़ती बेचैनी के बीच, चीन की "ग्रीन ग्रेट वॉल" एक दिलचस्प और बेहद अहम पहल के तौर पर सामने आती है।
जब भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, दुनिया भर के बाजारों की धड़कन तेज हो जाती है। टीवी चैनलों पर “युद्ध का खतरा”, “तेल की कीमतों में उछाल” और “वैश्विक आपूर्ति में झटका” जैसे शब्द अचानक आम हो जाते हैं। सवाल उठता है, आखिर दो देशों के बीच टकराव से पूरी दुनिया क्यों घबरा जाती है? इसका सीधा जवाब हमें हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य तक ले जाता है। यह वही जगह है, जहां से गुजरने वाली हर जहाज की चाल पर दुनिया की अर्थव्यवस्था टिकी होती है।
चीन की 'ग्रीन ग्रेट वॉल' सिर्फ़ पत्थर की नहीं, बल्कि पेड़ों, घास और मिट्टी से बनी 1,856 किमी लंबी रेगिस्तान रोकू बेल्ट है। यह गोबी सहित तीन बड़े रेगिस्तानों के फैलाव को रोक रही है। 1978 में शुरू यह प्रोजेक्ट 2050 तक पूरा होगा। चीन ने एकीकृत पर्यावरण संहिता बनाई है, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण से लेकर लो-कार्बन अर्थव्यवस्था तक सब शामिल। 2030 तक कार्बन पीक और 2060 तक कार्बन न्यूट्रल के लक्ष्य तय किए हैं। दुनिया की बढ़ती हरियाली में चीन का बड़ा योगदान है। देखिए... यह ख़ास वीडियो चीन की 'ग्रीन ग्रेट वॉल'।
भारत सरकार ने वर्ष 2025 को आर्थिक सुधारों के आधार स्तंभ के रूप में स्थापित करते हुए अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति में एक दूरगामी बदलाव किया है।
जब कोई विदेशी कंपनी या व्यक्ति भारत में किसी कंपनी, फैक्ट्री, बिजनेस या प्रोजेक्ट में सीधे पैसा लगाता है, तो उसे FDI कहते हैं। अब भारत सरकार ने चीन से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के नियमों में ढील दी है। नए नियमों के तहत अब उन निवेश प्रस्तावों को ऑटोमैटिक मंजूरी मिल जाएगी, जिनमें चीनी निवेशक की हिस्सेदारी 10% से कम हो। इसी मुद्दे को समझने के लिए आज हम दिल्ली यूनिवर्सिटी के देशबंधु कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह से बात करेंगे। वे ग्लोबल पॉलिटिक्स पढ़ाते हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर अच्छी पकड़ रखते हैं।