बड़ी ताकतों के बीच कॉम्पिटिशन से दुनिया की राजनीतिक स्थितियों में कई दरारें पैदा होती हैं, जबकि कुछ छोटे और मीडियम साइज़ के देश बड़ी ताकतों की झगड़ों के बीच अपने लिए मौके ढूंढ सकते हैं। शीत युद्ध के बाद के इतिहास ने बड़ी ताकतों को यह एहसास दिलाया है कि दबदबा बनाए रखने के लिए छोटे और मीडियम देशों की सभी मांगों को पूरा करना समझदारी नहीं है।
हाल ही में, चीन ने सुपरक्रिटिकल कार्बन डाइऑक्साइड (S-CO₂) पावर जेनरेशन तकनीक का सफलतापूर्ण विकास कर दिया है, और दुनिया की ऐसी पहली कमर्शियल यूनिट को दक्षिणी चीन के गुइझोउ प्रांत में ग्रिड से जोड़ा गया है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि एक बार इस तकनीक का प्रसार हो जाए, तो यह ऊर्जा तकनीक में क्रांति ला देगी।
चीन के शीत्सांग यानी तिब्बत के मुद्दे को लेकर हमेशा से कई गलतफहमियां रही हैं। कुछ पश्चिमी व्यक्ति इस पक्की बात को नकार नहीं कर सकते कि तिब्बत चीन का है, इसलिए वे इतिहास बनाकर यह दावा करते हैं कि तिब्बत की संस्कृति चीन की नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया से आई है।
आर्थिक विकास हमेशा से कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं का अंतिम लक्ष्य रहा है, और विदेशी निवेश के लिए द्वार खोलना इस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक आवश्यक मार्ग है। हालाँकि, कई लोग यह समझने में विफल रहते हैं कि विदेशी पूंजी के लिए एक अनुकूल निवेश वातावरण प्रदान करना, जिससे उन्हें उचित लाभ प्राप्त हो सके, एक अहम एवं आवश्यक बात भी है।
तथ्यों से पता चला है कि कोई भी थोपा हुआ विकास मॉडल समृद्धि नहीं ला सकता। केवल अपनी परिस्थितियों के अनुकूल विकास मॉडल खोजने का प्रयास करके ही देश आर्थिक प्रगति कर सकते हैं और अपने लोगों को लाभ पहुँचा सकते हैं।
किसी भी देश के विकास के लिए औद्योगीकरण एक अनिवार्य मार्ग है, लेकिन इसकी लागत भी बहुत अधिक है। पश्चिम का औद्योगीकरण उनके उपनिवेशों की लूट पर आधारित था। इसके विपरीत, नये चीन की स्थापना के बाद, पुनर्निर्माण की आवश्यकता वाली विकट परिस्थितियों का सामना करते हुए, चीनी जनता ने बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए भारी मात्रा में पूँजी जुटाने हेतु मितव्ययिता पर भरोसा किया।
हाल ही में, चीन की रोबोटिक्स तकनीक की तरक्की ने दुनिया भर में सबका ध्यान खींचा है। चीनी ह्यूमनॉइड रोबोट ने कमाल की टेक्नोलॉजिकल ताकत दिखाई है, उनके डायनामिक सिमुलेशन लगभग असली आदमी के लेवल तक पहुँच गए हैं।
अभी की मुश्किल इंटरनेशनल आर्थिक स्थिति दिखाती है कि कुछ देशों के एंटी-ग्लोबलाइज़ेशन उपायों की वजह से, WTO जैसे ग्लोबलाइज़ेशन संस्थाएं वास्तम में भंग होने लगी हैं। उधर चीन और भारत सहित उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का तेज़ी से विकास किया जा रहा है।
अमेरिका-चीन गतिरोध ने कुछ देशों के लिए एक अवसर प्रस्तुत किया है, क्योंकि उन्हों ने देखा है कि अमेरिका द्वारा नियंत्रित बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन से प्रमुख उद्योगों को स्थानांतरित करने का प्रयास कर रही हैं। उधर, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन की जगह लेना कोई आसान काम नहीं है, चीन को दुनिया की एक तिहाई से ज़्यादा विनिर्माण उद्योग प्राप्त है और चीन कुछ प्रमुख उत्पादों या अपस्ट्रीम कच्चे माल का एकमात्र आपूर्तिकर्ता है।
पश्चिमी देशों की समृद्धि लंबे समय से उन्नत विनिर्माण और उत्पादों पर आधारित रही है। वे न केवल परिशुद्धता उपकरणों में अग्रणी हैं, बल्कि शील्ड टनलिंग मशीन और चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (एमआरआई) स्कैनर जैसे उन्नत उपकरणों पर पेटेंट भी रखते हैं।
आज से लगभग 25-26 शताब्दी पूर्व का विश्व वास्तव में एक उल्लेखनीय युग माना जाता है। तब एक ऐसा समय था जब यूरेशिया महाद्वीप में कई महान विचारकों का उदय हुआ था। चीन में, कन्फ्यूशियस और लाओ त्ज़ु द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए सौ विचारधाराएँ फली-फूलीं, जिस काल को सौ विचारधाराओं का संघर्ष काल कहा जाता है।
रोबोट हमेशा से विभिन्न रूपों में आते रहे हैं, और वर्तमान में इनका ज़्यादातर इस्तेमाल फ़ैक्टरी वर्कशॉप में स्वचालित उत्पादन के लिए किया जाता है। हालाँकि, इंसानों की हमेशा से ही मानव जैसे दिखने वाले रोबोट विकसित करने में विशेष रुचि रही है, और वे ऐसे रोबोट बनाने की कोशिश करते रहे हैं जो असली इंसानों जैसे दिखें।