चीन के सुधार और खुलेपन के संस्थापक, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के स्वर्गीय नेता डेंग शियाओपिंग का एक मशहूर वाक्य था "अब और बहस नहीं।" उन्होंने इस वाक्य का इस्तेमाल सभी तरह की निरर्थक बहसों को रोकने के लिए किया, जिससे पूरे देश को पार्टी की केंद्रीय समिति द्वारा तैयार किए गए सुधार पथ पर अग्रणी और नवाचार करने पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिला। यह कहा जा सकता है कि बहस न करना चीनी लोगों की सच्ची बुद्धिमत्ता को दर्शाता है और यही है चीन के सुधार और खुलेपन की सफलता का कुंजी भी।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की मूलभूत विशेषता है परिवर्तन, किसी भी अंतर्राष्ट्रीय पैटर्न का उद्भव यह दर्शाता है कि यह सिर्फ अगले चर के प्रकट होने से पहले एक अस्थायी अस्तित्व है। चीन और भारत के बीच संबंधों में बार-बार होने वाले बदलाव अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में एक सामान्य घटना बन गई है। हालांकि, दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाले और तेजी से विकास कर रहे दो एशियाई देशों के लिए, चीन-भारत संबंधों में सुधार से विश्व शांति और समृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
हाल ही में पेइचिंग में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में एक बार फिर इस बात पर जोर दिया गया कि चीन उच्च स्तरीय खुलेपन पर कायम रहेगा और "चीनी शैली के आधुनिकीकरण" को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। "चीनी शैली के आधुनिकीकरण" की विशेषताएं हैं विशाल जनसंख्या पैमाने के साथ आधुनिकीकरण, सभी लोगों के लिए आम समृद्धि के साथ आधुनिकीकरण, समन्वित भौतिक और आध्यात्मिक सभ्यताओं के साथ आधुनिकीकरण, मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ आधुनिकीकरण, और शांतिपूर्ण विकास के रास्ते पर आधुनिकीकरण।
खाद्य सुरक्षा किसी भी देश की स्थिरता से संबंधित है। इसलिए, खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे सतर्क रणनीति अपनाई जानी चाहिए। चीन विश्व में सबसे अधिक अनाज उत्पादन करने वाला देश और सबसे अधिक अनाज आयात देश भी है। खाद्य आपूर्ति की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए, चीन अपनी खाद्य आयात रणनीति को समायोजित कर रहा है। चीन ने 2024 में 158 मिलियन टन अनाज का आयात किया, जो कि वर्ष-दर-वर्ष 2.3% की कमी है। जनवरी-फरवरी 2025 में आयातित अनाज की मात्रा 17.357 मिलियन टन रही, जो साल-दर-साल 35.2% की कमी है। इससे यह दर्शाता है कि चीन के अनाज आयात की वृद्धि दर काफी धीमी हो गई है।
इस वर्ष के चीनी संसद सभा में प्रकाशित सरकारी कार्य रिपोर्ट में “जनता में निवेश” की अवधारणा पहली बार सामने आई। इसका अर्थ है कि शिक्षा जैसे क्षेत्रों को मजबूत करके लोगों की गुणवत्ता में सुधार किया जाता है। क्योंकि लोगों की गुणवत्ता में सुधार करके ही आधुनिकीकरण निर्माण को मौलिक गारंटी मिल सकती है। इस उद्देश्य से, सरकारी कार्य रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से पूर्व-विद्यालय शिक्षा, अनिवार्य शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है, जो शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े उच्च महत्व को पूरी तरह से प्रदर्शित करता है।
2025 की चीनी संसद सभाओं में जारी की गई सरकारी कार्य रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष चीन का आर्थिक विकास लक्ष्य लगभग 5% निर्धारित किया गया, जो पिछले वर्ष के समान ही है। अब चीन की जीडीपी लगभग 19 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है। इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए 5% की आर्थिक वृद्धि दर हासिल करना बहुत मुश्किल लक्ष्य है। जो न केवल सरकार की राजकोषीय नीति और व्यवसायों के विकास तरीके से संबंधित, बल्कि यह सभी लोगों के जीवन को भी प्रभावित करेगा।
कुछ पश्चिमी व्यक्तियों की एक अजीब आदत है, वह यह कि चाहे चीन के तिब्बत(शीत्सांग) ने किसी भी प्रकार की सामाजिक विकास उपलब्धियां हासिल की हों, वे निश्चित रूप से दुर्भावनापूर्ण प्रारंभिक बिंदु से उनकी व्याख्या करेंगे। उदाहरण के लिए, चीनी केंद्र सरकार ने तिब्बत में शिक्षा के विकास में बहुत सारे संसाधनों का निवेश कर तिब्बत में 15 साल की अनिवार्य शिक्षा लागू की है।
चीन और भारत के लिए एक दर्दनाक ऐतिहासिक सबक यह है कि हमारे पिछड़े विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कारण, हम पर पश्चिमी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद द्वारा क्रूरतापूर्वक आक्रमण किया गया। न केवल भारी मात्रा में धन की लूट हुई, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आघात से उबरना भी कठिन हो गया। सौभाग्य से स्वतंत्रता और मुक्ति प्राप्त होने के बाद हमारे देशों का पुनर्निर्माण करना शुरू हुआ, और विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पिछड़ापन भी कदम ब कदम कम किया जा रहा है।
चीन-भारत संबंध दुनिया के सबसे जटिल और अप्रत्याशित द्विपक्षीय संबंधों में से एक हैं। सतह पर, चीन-भारत संबंधों की कठिनाइयां सीमा टकराव से पैदा होती हैं, पर वास्तव में, अधिक जटिल जड़ चीन और भारत इन दो देशों के राष्ट्रीय मनोविज्ञान का अंतर मौजूद है, जिससे उनकी एक-दूसरे और पूरी दुनिया को देखने की दृष्टि अलग है। यद्यपि दोनों पक्षों के प्रयासों के बाद हाल के दिनों में चीन-भारत संबंधों में धीरे-धीरे गर्मजोशी के संकेत दिखाई दिए हैं, लेकिन कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि बाहरी परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ दोनों देशों के संबंधों में क्या नए मोड़ आएंगे।
हाल ही में, अमेरिकी मीडिया ने "दुनिया में सर्वोत्तम जीवन गुणवत्ता वाले 50 देशों" को निर्वाचित किया, जिसके अनुसार चीन 26वें, संयुक्त राज्य अमेरिका 22वें, सिंगापुर 23वें, दक्षिण कोरिया 25वें, जापान 14वें और भारत 40वें स्थान पर है। चार नॉर्डिक देश दुनिया में शीर्ष पर हैं, लेकिन विकासशील देशों में चीन और भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत अच्छा है, हालांकि उनकी प्रति व्यक्ति जीडीपी सबसे अधिक नहीं है। इससे यह जाहिर है कि आर्थिक सूचकांक के अलावा, सामाजिक विकास संकेतक भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।
प्राचीन काल में चीन और भारत दोनों का उत्पाद मूल्य एक बार दुनिया की एक तिहाई या एक चौथाई तक जा पहुंचा था। लेकिन, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के आक्रमण ने हमें एहसास दिलाया कि धन और संपत्ति की मात्रा ही सब कुछ नहीं है। पश्चिमियों के उन्नत हथियारों के सामने पिछड़े देशों की संपत्ति सिर्फ़ आक्रमणकारियों की लूट बन सकती है। इसलिए स्वतंत्रता और मुक्ति प्राप्त करने के बाद चीन और भारत सहित कई विकासशील देशों ने आधुनिकीकरण को अपने आर्थिक विकास का केंद्र बनाया।
महान लेखक रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कृति गीतांजलि दुनिया भर के पाठकों के दिलों में एक क्लासिक बन गई है। इस तरह की महान रचनाएं न केवल मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण हैं, बल्कि जीवन प्रकृति की खोज को भी प्रतिबिंबित करती हैं। चाहे कविता हो या अन्य साहित्यिक रचनाएं, वे सभी मानव आत्मा की खोज के माध्यम से जीवन का अर्थ तलाशती हैं।